Monday, September 9, 2019

मै चाहती हूँ ।


मै बचपन में ही रहना चाहती हूँ                                                   
बड़ा नही मै होना चाहती हूँ 
नादान परियों की तरह गाँव की,
गलियों में मै खेलना चाहती हूँ ।

खुद से  बाते करती हूँ
आसमां में उड़ना चाहती हूँ
अब और नही पिंजरो में,
मै खुद को रखना चाहती हूँ

आज़ाद गगन की पंछी हूँ
मै दुनिया देखना चाहती हूँ
कैद हूँ मुझे लगता यहां,
अब आज़ाद होना चाहती हूँ ।

मै लहरों से भी खेलना चाहती हूँ
मै सागर में भी तैरना चाहती हूँ
मुझे खौफ़ नही है डूबने का,
मै मोतियों को भी चुराना चाहती हूँ ।

मै जीवन को जीना चाहती हूँ
अपने हुनर से कुछ करना चाहती हूँ
परवाह नही मुझे किसी की,
रास्ते अब खुद बनाना चाहती हूँ ।।

चांद से भी मिलना चाहती हूँ
सितारों से भी कुछ कहना चाहती हूँ
दुनिया को ये बताना चाहती हूँ
अगर समझते हो अबला मुझे,
नही हूँ कमजोर ,ये दिखाना चाहती हूँ ।

अपना अलग ताल बनाना चाहती हूँ
नये सूर से सूर मिलाना चाहती हूँ
मै हूँ स्वरों की एक सरगम,
ऐसी राग दुनिया को सुनाना चाहती हूँ ।

मै गांवो में भी बसना चाहती हूँ
मै खेतों में भी झूमना चाहती हूँ
मै पेड़ों पर भी खेलना चाहती हूँ
मै पतझड़ में भी बसंत चाहती हूँ
मै सावन में भी नाचना चाहती हूँ
इंतज़ार है मुझे फाल्गुन का भी,
ऐसे रंगो की होली मै खेलना चाहती हूँ ।

हे! प्रिय मै तुमसे मिलना चाहती हूँ
अपने दर्द को तुमसे बांटना चाहती हूँ
तुम्हारे कहे हुए हर एक अल्फाज़ से,
मै अपनी कविता बनाना चाहती हूँ ।
                             
                             श्वेता यादव 'नारी '

Tuesday, September 3, 2019

एक अधूरी मुलाक़ात

घर की साफ़ सफ़ाई करते-करते मेरी नज़र दीवार के एक कोने मे रखे संदूक पर पड़ी।उसे खोलते ही एक फटी-पुरानी धूल से जमी हुई एक डायरी दिखाई पड़ती है।डायरी बिल्कुल बेसुध सी लाचार पड़ी हुई थी।ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे वो  मुझसे कुछ कहना चाह रही है। मैने तुरंत ही उस बेसुध पड़ीं डायरी पर हाथ फेरते हुए उसपर जमी धूल को साफ़ किया और बिना देर किये जैसे ही पहला पन्ना खोलते  ही मेरी डायरी मुझसे बोल पड़ीं,कहने लगी,"श्वेता! तुम मुझे भुल गई हो ना!, मै कुछ कहती तबतक पुन: बोल पड़ी,"श्वेता तुम कुछ मत बोलो,मुझे बोलने दो।मुझे आठ दस सालों से तुमने कुछ बोलने नही दिया है।मुझे लावारिस की तरह किसी कोने मे फेक दिया था।इतना सुनते ही मेरी आंख भर आयी और गला भी रुदन से भर गया फिर भी खुद को संभालते हुए धीमी आवाज में अपनी डायरी से बोली,"नही! मै तुम्हे कैसे भुल सकती हूँ?!तुम तो मेरी लेखनी की पहली साथी हो जिसके जिस्म पर मेरी कलम चली थी।मेरी लेखनी ने तुम्हे ही तो सबसे पहले छुआ था।उस पहली छुवन का एहसास हो तुम। भला मै और मेरी लेखनी कैसे भुल सकते हैं तुम्हे।मेरे इस प्रत्युत्तर के बाद मै और मेरी डायरी चुप चाप टकटकी निगाहों से एक दूजे को निहारते रहे।तबतक मेरी डायरी बोल पड़ी,"अब चुप क्यूँ हो मुझे खोलो और देखो खुद को की तुम कितना मुस्कुराया करती थी।मुझे खोलो और देखो की कैसे स्कुल के दिनों में छोटी-छोटी चीजों में बड़ी बड़ी खुशियाँ खोज लिया करती थी। मेरे अंदर अपनी शैतानियों को देखो,तुम पानी पीने के बहाने से स्कूल के पूरे कैम्पस का भ्रमण कर आती थी। श्वेता! मै तुम्हे इस संदूक मे से देख तो सकती थी पर बोल नही सकती थी।मुझे तुम्हारी तकलीफें सहन नही हो रहीं थीं।मै सबकुछ देखते हुए भी बेजुबां लाचार सी पड़ी रहती थी।
इतना सुनते ही मेरे आंखो में अश्क भर आये और मैने डायरी को चूमकर अपने सीने से लगा लिया।
मै एक-एक करके उन लम्हों को महसूस कर रही थी और पन्ने पलटती जा रही थी।

उस डायरी में एक मासूम ने अपनी मासूमियत को पहली बार लिखने की अच्छी कोशिश किया था।उन लम्हो को महसूस करते करते ऐसा महसूस होने लगा की क्लास के अन्तिम बेंच पर बैठकर 'टॉम ऐण्ड जेरी' देख रही हूँ। कभी कभार तो कैन्टीन में दोस्तो के साथ चाय भी पीने चली गई।अचानक से तो मै डर ही गई,मेरे बैग मे टीचर ने एक खत पकड़ लिये ,मुझे भनक भी नही थी उस खत के बारे मे,किसी ने मेरे बैग मे जानबूझकर वो खत रख दी थी। तबतक लंच हो चूका था। सभी अपने अपने लंच बॉक्स खोलकर बेंच पर रखने लगें। कोई किसी का लंच छिन-झपटकर खा रहा था तो कोई किसी का स्वादिष्ट लंच देखते ही लेकर भाग जा रहा था। छीना-झपटी मे लंच फर्श पर भी बिखर जा रहा था।
तभी एक दोस्त ने पेटीज़ खाने की फरमाइश की।लेकिन किसी के पास 10 रुपए नही थे जिससे पेटीज़ खरीदा जा सके ।खैर! जैसे-तैसे एक-एक रुपए इकट्ठे करने के बाद पेटीज़ खरीद ही लाये। पेटीज़ एक ही था और खाने वाली संख्या दस थी।सभी सोच ही रहे थे की एक- एक बाइट शेयर करेंगे। तभी मै बिना देर किये बन्दर की तरह उस पेटीज़ पर झपट्टा मारने ही वाली थी की डायरी के आखिरी पन्ने पर पहुँच गई।मैने उसपर अपनी उंगलियाँ सहलाई,उसपर लिखे एक-एक शब्द को महसूस करने की कोशिश की तबतक वो डायरी बन्द हो चुकी थी।और इससे पहले की मै सोचती या कुछ बोलती। एक आवाज सी आयी,"श्वेता! आते-जाते रहना।।
         
                                                                                     श्वेता यादव 'नारी '

Monday, September 2, 2019

कुछ यूँ इस तरह महसूस करते हैं

कुछ यूँ इस तरह महसूस करते हैं
जैसे रेगिस्तान मे दूर से आता हुआ प्यासा उंट
जो अपने कंधो पर तमाम बोझ लिये
धीरे-धीरे चलते-चलते आ रहा हो।
फिर भी दूर दूर तक सिर्फ रेतीली जमीन 
के सिवा कुछ दिखाई नहीं दे रहा होता है
आंखो मे आशा,होंठो पर प्यास लिये
चले आ रहा है जैसे इस उम्मीद से की
अब कहीं तो होंठो का रुखापन खत्म होगा।
कुछ इस तरह महसूस करते हैं
जैसे रेगिस्तान मे दूर से आता हुआ प्यासा उंट
                      
                         श्वेता यादव'नारी '

Monday, August 26, 2019

एक झलक

                                              
तलब सी थी उनकी एक झलक पाने को,
 वस्ल मयस्सर मे भी आंख भर देख ना पाई।।