मै बचपन में ही रहना चाहती हूँ
बड़ा नही मै होना चाहती हूँ
नादान परियों की तरह गाँव की,
गलियों में मै खेलना चाहती हूँ ।
खुद से बाते करती हूँ
आसमां में उड़ना चाहती हूँ
अब और नही पिंजरो में,
मै खुद को रखना चाहती हूँ
आज़ाद गगन की पंछी हूँ
मै दुनिया देखना चाहती हूँ
कैद हूँ मुझे लगता यहां,
अब आज़ाद होना चाहती हूँ ।
मै लहरों से भी खेलना चाहती हूँ
मै सागर में भी तैरना चाहती हूँ
मुझे खौफ़ नही है डूबने का,
मै मोतियों को भी चुराना चाहती हूँ ।
मै जीवन को जीना चाहती हूँ
अपने हुनर से कुछ करना चाहती हूँ
परवाह नही मुझे किसी की,
रास्ते अब खुद बनाना चाहती हूँ ।।
चांद से भी मिलना चाहती हूँ
सितारों से भी कुछ कहना चाहती हूँ
दुनिया को ये बताना चाहती हूँ
अगर समझते हो अबला मुझे,
नही हूँ कमजोर ,ये दिखाना चाहती हूँ ।
अपना अलग ताल बनाना चाहती हूँ
नये सूर से सूर मिलाना चाहती हूँ
मै हूँ स्वरों की एक सरगम,
ऐसी राग दुनिया को सुनाना चाहती हूँ ।
मै गांवो में भी बसना चाहती हूँ
मै खेतों में भी झूमना चाहती हूँ
मै पेड़ों पर भी खेलना चाहती हूँ
मै पतझड़ में भी बसंत चाहती हूँ
मै सावन में भी नाचना चाहती हूँ
इंतज़ार है मुझे फाल्गुन का भी,
ऐसे रंगो की होली मै खेलना चाहती हूँ ।
हे! प्रिय मै तुमसे मिलना चाहती हूँ
अपने दर्द को तुमसे बांटना चाहती हूँ
तुम्हारे कहे हुए हर एक अल्फाज़ से,
मै अपनी कविता बनाना चाहती हूँ ।
श्वेता यादव 'नारी '




